चुनाव बाद कार्यकर्ताओं की अनदेखी? फोन तक नहीं उठाते नेता, संगठनात्मक व्यवहार पर सवाल




शिवपुरी/पोहरी – चुनाव के दौरान दिन-रात मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं की पीड़ा अब खुलकर सामने आने लगी है। आरोप है कि सत्ताधारी दल हो या अन्य राजनीतिक दल, चुनाव जीतने के बाद कई जनप्रतिनिधि और पदाधिकारी अपने ही कार्यकर्ताओं की अनदेखी करने लगते हैं। फोन तक नहीं उठाए जाते, जिससे कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष बढ़ रहा है।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब वे जनसमस्याओं को लेकर अपने वरिष्ठ नेताओं—विधायक या जिलाध्यक्ष—से संपर्क करने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यही मानवता है या फिर यह नेतागिरी का नया उसूल बन गया है।

हाल ही में पोहरी विधानसभा क्षेत्र में एक ऐसा मामला सामने आया, जहां एक स्थानीय नेता को कथित रूप से जिलाध्यक्ष तक पहचानने से इंकार कर दिया गया। इसी तरह खोड़ क्षेत्र के एक लोधी समाज से जुड़े कार्यकर्ता के साथ भी ऐसा ही व्यवहार होने की बात कही जा रही है।

इस स्थिति से आहत कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम हो गई है कि "मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं" जैसी कहावत अब हकीकत बनती नजर आ रही है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते संगठनात्मक व्यवहार में सुधार नहीं किया गया, तो इसका असर न केवल कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा, बल्कि भविष्य के चुनावों में भी देखने को मिल सकता है।
दुर्गेश गुप्ता
समय खबर
शिवपुरी

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