ऑनलाइन गेमिंग की भेंट चढ़ता बच्चो का जीवन...!
👉स्क्रीन की गिरफ्त में बचपन: अब चेतना ही बचाव है..!
🔏"सॉरी मम्मी-पापा,हम गेम नही छोड़ पा रहे..."यह शब्द लिखकर तीन नाबालिग बहनों ने बिल्डिंग की 80 फिट ऊंचाई की बालकनी से छलांग लगाकर जीवन लीला समाप्त कर ली।उफ..??? गाजियाबाद की हालिया घटना ने पूरे देश को भीतर तक झकझोर दिया। मोबाइल गेम की लत के कारण तीन मासूम बहनों का एक साथ जीवन समाप्त कर लेना केवल एक परिवार का शोक नहीं, बल्कि उस समाज की त्रासदी है जो अपने ही बच्चों के मन की आवाज सुनने में असफल हो रहा है। घरों में मोबाइल की रोशनी बढ़ती गई, पर संवाद का उजाला कम होता गया। बच्चों की दुनिया स्क्रीन के भीतर सिमटती गई और हम यह समझ ही नहीं पाए कि उनके भीतर कितना दबाव, अकेलापन और मानसिक संघर्ष जमा हो रहा है जो डिटॉक्स होना चाहिये था मगर नही हुआ।परिणाम किसी बड़ी घटना के रूप में सामने आया।
यह पहली बार नहीं हुआ। पिछले वर्षों में ब्लू व्हेल जैसे खतरनाक ऑनलाइन चैलेंज,मोबाइल गेम पवजी, ऑनलाइन गेमिंग की लत, साइबर बुलिंग और सोशल मीडिया दबाव से जुड़े अनेक मामले सामने आए। इंदौर, हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली, भोपाल,लगभग हर बड़े शहर ने किसी न किसी रूप में ऐसे हादसे देखे हैं, जहाँ बच्चों ने आभासी दुनिया की हार-जीत को जीवन-मरण का प्रश्न बना लिया। कई मामलों में गेम की लत ने बच्चों को परिवार से अलग कर दिया, कई जगह ऑनलाइन अपमान या दबाव ने उन्हें मानसिक अवसाद में धकेल दिया।
असल समस्या केवल गेम नहीं, बल्कि डिजिटल अकेलापन है। घरों में लोग साथ रहते हैं, पर बातचीत कम होती जा रही है। माता-पिता अपने संघर्षों में व्यस्त हैं और बच्चे अपने कमरे व मोबाइल की दुनिया में। जब बच्चा अपनी तकलीफ घर में कहने के बजाय इंटरनेट में जवाब खोजने लगे, तब खतरे की घंटी बज चुकी होती है।आये दिन लोमहर्षक घटनाएं अखबारों की सुर्खियां बन रही है और हम सिर्फ अफसोस जाहिर कर खेद प्रकट करने की मुद्रा में आ गये है।
अब सवाल केवल दुख जताने का नहीं, बल्कि ठोस सुधार की दिशा तय करने का है। कानूनी ढांचे में भी ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जिन्हें सख्ती से लागू करने की जरूरत है। भारतीय दंड संहिता की धारा 305 और 306 आत्महत्या के लिए उकसाने वालों पर कठोर दंड का प्रावधान करती हैं, इसलिए यदि कोई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, समूह या व्यक्ति बच्चों को खतरनाक मानसिक स्थिति की ओर धकेलता है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई संभव है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएँ 66E, 67 और 67B बच्चों को हानिकारक या आपत्तिजनक डिजिटल सामग्री उपलब्ध कराने वालों पर कार्रवाई की अनुमति देती हैं। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और POCSO कानून बच्चों की सुरक्षा को राज्य व समाज दोनों की जिम्मेदारी मानते हैं, जबकि नेशनल या स्टेट चाइल्ड राइट्स कमीशन के समक्ष भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
किसी भी प्रकार की ऑनलाइन धमकी या खतरनाक डिजिटल गतिविधि के मामलों में साइबर सेल तक तुरंत पहुँचना आवश्यक है।
पर कानून अकेले समाधान नहीं हैं। असली लड़ाई घर और समाज के स्तर पर लड़ी जानी है। परिवारों को बच्चों के साथ संवाद का समय बनाना होगा, स्क्रीन टाइम सीमित करना होगा और देर रात मोबाइल उपयोग पर नियंत्रण रखना होगा। बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, चिड़चिड़ापन, अकेलापन या पढ़ाई से दूरी जैसे संकेतों को मामूली बात समझकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए और बच्चों को खेल, कला, पुस्तक तथा सामाजिक गतिविधियों से जोड़ना जरूरी है ताकि उनका जीवन केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित न रह जाए।
मीडिया और समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आत्महत्या की घटनाओं को सनसनी बनाकर परोसने के बजाय जागरूकता और समाधान पर ध्यान दिया जाना चाहिए।स्थानीय स्तर पर अभिभावक जागरूकता कार्यक्रम और बच्चों के लिए हेल्पलाइन तथा परामर्श सेवाओं की जानकारी उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। बच्चों को असफलता से निपटना सिखाना उतना ही जरूरी है जितना उन्हें सफलता का रास्ता दिखाना।उन्हें यह बताना कि तकनीक से पहले भी जीवन था और उस जीवन मे आज की अपेक्षा बहुत अधिक आनंद था।
तकनीक को दोष देना आसान है, पर सच्चाई यह है कि तकनीक का उपयोग कैसे हो, यह समाज को तय करना होगा। मोबाइल छीन लेने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि संवाद, विश्वास और सहारा ही बच्चों को जीवन की ओर लौटाता है। आनंद की दुनिया आभाषी मंच में नही बल्कि धरातल के मंच पर है जहाँ एक दूसरे का साथ जरूरी है।
आज जरूरत केवल कानून की नहीं, संवेदनशीलता की है। क्योंकि अगर हम अब भी नहीं जागे, तो अगली खबर किसी और शहर से नहीं, बल्कि शायद हमारे ही कुनवे से आएगी,और तब सवाल फिर वही होगा कि हमने अपने बच्चों को सब कुछ दिया, बस अपना समय और समझ क्यों नहीं दी...?
सवाल तब भी वही होगा कि आखिर हम कहाँ चूक गए...!
✍️बृजेश सिंह तोमर
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार,समाज चिंतक एवं अभिभाषक है)
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