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मप्र उपचुनाव : डबरा में इमरती को नहीं लगता खतरा

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उपचुनाव डबरा

डॉ. अजय खेमरिया

अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित ग्‍वालियर जिले की डबरा सीट पर बीजेपी की उम्मीदवार इमरती देवी सुमन संभवत: सभी 22 दलबदल करने वाले विधायकों में सबसे कम्फर्टेबल पोजीशन में कही जा सकती हैं। लो प्रोफ़ाइल कार्य संस्‍कृति के चलते वह इस बार भी डबरा से कमल निशान पर जीत सकतीं है ऐसा आम लोग मानते हैं। कांग्रेस के पास उनकी टक्कर में कोई मजबूत प्रत्याशी नहीं है। इसलिए वह बसपा से तीन बार डबरा नगरपालिका की अध्यक्ष रह चुकीं सत्यप्रकाशी परसेडिया पर दांव लगाने की तैयारी कर रही है।

डॉ. गोविन्द सिंह सत्यप्रकाशी से मुलाकात कर चुके है और बसपा ने भी कल उन्हें पार्टी से निकाल दिया है। स्पष्ट है इमरती देवी के सामने डबरा में सत्यप्रकाशी परसेडिया कांग्रेस की उम्मीदवार होंगी। पिछले चुनाव में सत्यप्रकाशी के स्थान पर बसपा ने ग्वालियर के एक रिटायर्ड सीईओ को टिकट दे दी थी इसलिए यहां बसपा मुकाबले से ही बाहर हो गई थी।

2008 के चुनाव में यहां बसपा के श्योपुर से आयातित प्रत्याशी हरगोविंद जौहरी को 18504 औऱ 2013 में सत्यप्रकाशी को 19068 वोट मिले थे। असल में इस सीट पर 1990 से ही बसपा ने अपनी पकड़ बरकरार रखी है। कभी बघेल, कभी रावत जाति के साथ अपने कोर जाटव वोट के साथ तगड़ी चुनौती खड़ी की है। 1993 में तो जवाहर रावत ने नरोत्तम मिश्रा को 5308 वोट से हरा दिया था।

डबरा की सीट कभी प्रदेश के कद्दावर बीजेपी नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा के नाम से पहचानी जाती थी। 1990 में वे यहां से पहली बार विधायक बने और 1993 को छोड़ लगातार जीतते रहे। 2008 में परिसीमन के बाद डबरा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई, तब से बीजेपी यहां जीत के लिए तरस गई। इमरती देवी एकमात्र ऐसी विधायक हैं जो हर चुनाव में अपनी जीत का मार्जिन बढ़ाकर जीत रही हैं। 2008 में इमरती को 29134 वोट, 2013 में 67764 और 2018 में 90598 वोट हासिल हुए थे।

दलित, ब्राह्मण, सिंधी, गुर्जर, कुशवाहा, साहू, बघेल, मुस्लिम, यादव, परिहार, वैश्य, जाट, सिख, रावत बिरादरियों की प्रभावशीलता वाली इस सीट पर इमरती देवी की जीत का बुनियादी आधार उनका गांव-गांव सतत और आत्मीय सम्पर्क है। हर जाति वर्ग के मध्य इमरती की स्वीकार्यता उनकी मिलनसारिता और अहंमुक्त लोकसंपर्क ही है। कैबिनट मंत्री रहते हुए भी उनकी इस सहजता में कोई कमी नहीं आई।

इमरती भले ही पढ़ी लिखी नहीं हैं, लेकिन लोकमन के अनुरूप संव्यवहार की कला उनसे सीखी जा सकती है। उनका आत्मविश्वास किताबी ज्ञान को कमतर साबित करता है। अपने नेता सिंधिया के प्रति उनकी निष्ठा भी असन्दिग्ध है।

जिन 22 लोगों ने बीजेपी ज्वाइन की है उनमें इमरती का ताजा बयान सबसे परिपक्व कहा जा सकता है, जिसमें उन्होंने यह भी कहा है कि अगर बीजेपी उन्हें टिकट नहीं भी देगी तो भी वह पूरे मन से डबरा में बीजेपी को जिताने के लिए काम करेंगी।

असल मे डबरा की सियासत का निर्णायक सिरा नरोत्तम मिश्रा के हाथ में ही है और यह संयोग ही है कि 2008 से हर चुनाव में बीजेपी ऐसे उम्मीदवार उतारती रही है जो नरोत्तम मिश्रा की पसन्द के नहीं रहे हैं। दूसरा दतिया से वह खुद चुनाव में फंसे रहते हैं, इसलिए यहां बीजेपी की कोई कहानी नहीं बन पाती है।

इमरती देवी का यह कहना कि सीएम, नरेंद्र सिंह, सिंधिया और नरोत्तम को मैदान में तो आने दीजिये, काफी कुछ कहता है। इस बार नरोत्तम चुनाव में खुद नहीं फंसे होंगे, तब डबरा में उनकी ताकत का पहली बार अधिकतम उपयोग हो सकेगा। शायद यही कहने का आशय इमरती देवी का भी है।

डबरा में बसपा का प्रभाव भी आरम्भ से ही रहा है। बसपा के प्रभाव के बावजूद यहां इमरती देवी का ग्राफ हर चुनाव में नॉन जाटव वोटरों में जबरदस्त ढंग से बढ़ता गया है। हालांकि मंत्री के रूप में उनके पास डबरा को लेकर कोई खास उपलब्धि नहीं है। डबरा भितरवार को मिलाकर जिला बनाने की मांग यहां काफी पुरानी है, लेकिन इमारती कमलनाथ सरकार में इस मुद्दे पर कुछ खास नही कर पाईं।

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने यहां सांसद रहते सड़कों का बेहतरीन जाल बिछाया है। इमरती के लिए शिवराज, तोमर, सिंधिया और नरोत्तम की कैम्पेन बहुत ही लाभकारी साबित होगी। डबरा में ब्राह्मण, वैश्य, साहू, सिंधी, सिख जैसी जातियां वैसे तो बीजेपी को वोट करती हैं लेकिन विधानसभा क्षेत्र से नरोत्तम के जाने के बाद इमरती के साथ खड़ी रही हैं।

यहां असली घमासान रावत, गुर्जर, कुशवाह, बघेल जैसी जातियों के वोटों को लेकर होगा। कांग्रेस में रामनिवास रावत, साहब सिंह गुर्जर, रामसेवक सिंह गुर्जर बाबूजी, फूल सिंह बरैया जैसे नेताओं को जातिगत आधार पर इमरती की घेराबंदी के लिए लगाया जाएगा। वस्तुतः डबरा में वोटिंग ट्रेंड को आप इसलिए आसानी से समझ सकते है कि नरोत्तम मिश्रा सरकार बचाने और सिंधिया प्रतिष्ठा बचाने के लिए एकीकृत होकर जुटेंगे तो नतीजे चौथी बार भी इमरती के पक्ष में आ सकते है।

डबरा के संबंध में एक तथ्य यह भी ध्यान रखना होगा कि पिछले 4 लोकसभा चुनाव में यहां बीजेपी पस्त नजर आई है। 2014 में तो नरोत्तम मिश्रा की खुली मदद के बाबजूद यहां से केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर को पराजय झेलनी पड़ी थी।

यहां एक दूसरा तथ्य यह भी है कि बसपा का कोर वोटर सामान्यतः बसपा के हाथी निशान को ही चुनता रहा है। इसलिए बसपा प्रत्याशी की मौजूदगी के बावजूद बीजेपी का मुकाबले से बाहर जैसा प्रदर्शन सामान्य और ओबीसी जातियों के मिजाज को रहस्यमयी बनाता है, खासकर विधानसभा के नजरिये से।

फिलहाल इमरती देवी को शिवराज, तोमर,सिंधिया और नरोत्तम के मैदान में आने पर चौथी जीत का भरोसा तो है ही।

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