आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिले की 556 ग्राम पंचायतो के 12 सौ गांव की बसाहट बनी सोशल डिस्टेंसिंग का अद्धितीय उदाहरण - samay khabar

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आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिले की 556 ग्राम पंचायतो के 12 सौ गांव की बसाहट बनी सोशल डिस्टेंसिंग का अद्धितीय उदाहरण

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बैतूल से रामकिशोर दयाराम पंवार की रिपोर्ट

बैैतूूल- टटपश्चिम से पूर्व की ओर 161 कि.मी. तथा दक्षिण से उतर की ओर 106 कि.मी. लम्बे चौड़े 10,059.48 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल वाला बैतूल जिला 1823 में वजूद में आया.जिले की वर्तमान में जनसंख्या अखण्ड भारत का केन्द्र बिन्दू कहे जाने वाले बैतूल जिले में वर्ष 2011 की जनसंख्या के अनुसार जिले में 1,575,247 में पुरुष 799,721 तथा महिला 775,526 है. बैतूल जिले में जनसंख्या वृद्धि 12.91 प्रतिशत है 
जो मध्यप्रदेश की जनसंख्या का अनुपात 2.17 प्रतिशत है. लिंग अनुपात प्रति 1000 पर 970 दर्ज है. 10 विकासखण्डो एवं 4 अनुविभागो की 8 तहसीलो में विभाजित बैतूल जिले में 556 ग्राम पंचायतो में कुल दर्ज आबादी वाले गांवो की संख्या (वर्ष 1961 के अनुसार) 1, 276 है तथा 87 निर्जन गांव है. वर्तमान में जिले में 1,473 गांवो में 1,305 राजस्व , 94 वनग्राम तथा 74 विरान गांव है जो कभी बसे थे. एक जानकारी के अनुसार बैतूल जिले में बैतूल जनपद में 77, आमला में 68 ,मुलताई में ६९, प्रभात पटट्न में ६५, चिचोली में ३३, भीमपुर में ५४,भैसदेही में ५०,शाहपुर में ४०,आठनेर में ४४,घोडाडोंगरी में ५६ ग्राम पंचायते है.l

आदिवासी बाहुल्य गांवो की
बसाहट सबसे बड़ा सोशल डिस्टेंस
बैतूल जिले में सबसे अधिक आदिवासी विकासखण्ड है तथा गांवो एवं जनपदो तथा पंचायतो का आधार भी आदिवासी है. जिले में अधिकांश आदिवासी बाहुल्य गांवो में टोले - माजरे देखने को मिलते है. एक गांव में चार यदि मोहल्ले है तो उसमें जाति आधार प्रमुख है. गांवो में देखने को मिलता है कि अपने वर्ग क्षेत्रफल में दूर - दूर तक बसाहट के संग फैला हुआ है ।
जिसके कारण एक मोहल्ले को दुसरे मोहल्ले से जोडऩे का काम अधिकांश ग्राम पंचायतो के लिए सरदर्द का कारण बना हुआ है. गांवो में दूर - दूर  तक बसाहट के कारण गांवो में अकसर पानी और हवा के माध्यम से फैलने वाले बीमारी पूरी तरह गांवो को जकड़ नहीं पाती है. बेहद चौकान्ने वाली बाते तो यह देखने को मिलती है कि गांवो मे ंअलग - अलग मोहल्ले के हिसाब से लोगो के कुओ से लेकर लेकर खेत खलिहाान तक दूर - दूर तक बस गए है. गांवो के अनुपात में 20 प्रतिशत ग्रामिण आबादी अपने गांव से दूर अपने खेत खलिहान में ही रैन बसेरा कर रहे है.

गांवो की गलियो ने मकानो के बीच बनाई दूरियां
एक दुसरे लगे हुए नहीं देखने को मिलते है मकान
जिले के अधिकांश गांवो में बने कच्चे एवं पक्के मकान एक दुसरे की दिवारो से लगे न होकर उनके बीच काफी दूरी है. यही कारण है गांव के घरो के बीच की गली जिसमें आम देहाती बोली में सामट कहते है वही सामट गांवो में शामत नहीं ला सकी. आकड़ो के अनुसार जिले के गांवो में आजादी के बाद एवं आजादी के पहली फैली हैजा, प्लेग, चेचक, टीबी, पोलियों जैसी बीमारियों पर पूरे गांव प्रभावित न होकर मोहल्ले प्रभावित हुए है।
 जिसके कारण गांव वाले एक मोहल्ले से दुसरे मोहल्ले के बीच आवाजाही से लेकर किसी भी प्रकार के संपर्क से स्वंय को दूर कर लेते है. गांवो की हकीगत तो तब देखने को मिली जब एक ही गांव में बने चार अलग - अलग मोहल्ले टोले एवं माजरे में सबके अपने अलग - अलग देच स्थान तक बने हुए है. बैतूल जिले में एक गांवो से दूसरे गांव की दूरियां भी बेहद चौकान्ने वाली है. जिले के गांवो को चार भागो में बांटा गया है. पहली श्रेणी में आने वाले गांव में ऐसे गांवो का प्रतिशत है जो 500 से अधिक नहीं है. वर्ष 1961 की जनसंख्या के अनुसार जिले में 75.24 प्रतिशत ऐसे गांव है जिनकी आबादी 500 से कम है.।
500 से 999 आबादी वाले गांवो का प्रतिशत 18.26 प्रतिशत है. 1,000 से 1,999 आबादी वाले गांवो का प्रतिशत 5.64 प्रतिशत, 2,000 से 4,999 आबादी वाले गांवो का प्रतिशत 0.78 प्रतिशत 5,000 से 9,999 आबादी वाले गांवो का प्रतिशत 0.08 प्रतिशत है तथा 10,000 से अधिक आबादी वाले गांवो का प्रतिशत 0.०00 प्रतिशत है. वर्ष 2011 की जनसंख्या के आकड़ो के बाद हो सकता तस्वीर कुछ और ही हो लेकिन जिले में सबसे अधिक ऐसे गांव है जिनकी आबादी बमुश्कील 500 भी नहीं है.
गांवो ने परिवार नियोजन का अद्धितीय उदाहरण पेश किया
धनोरा लगभग सौ सालो से नहीं बढ़ सकी गांव की आबादी
यूं तो पूरे देश दुनिया में कांग्रेस धनोरा, पारसडोह धनोरा के नाम से जाना पहचाने जाने वाला गांव जनसंख्या के दबाव के कंट्रोल में टूट कर बिखर गया लेकिन उसने अपने परिवार नियोजन के मूल सिद्धांत को 1922 से लेकर आज तक कायम रखा है. 
लगभग सौ साल पूरे होने जा रहे धनोरा गांव की आबादी आज भी दो हजार से अधिक नहीं है. गांव की बढ़ती आबादी ने अपने लिए आसपास में गांव बसा लिए लेकिन गांव को हम दो हमारे दो के मूल मंत्र से भटकने नहीं दिया. 1922 में जिस गांव में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जीवन संगनी श्रीमति कस्तुरबा गांधी बा आई थी उस गांव के आसपास पूरी जमीने या जो छोटे झाड़ का जंगल थी या फिर खेती बाड़ी वाली. धनोरा गांव की बढ़ती आबादी ने नए गांवो को बसाहट दी जिसमे पुसली, धनोरी, जावरा, मानी जैसे कई गांव है जो 1922 के बाद बसाहट का रूप लेकर अपने वजूद में आए.
चारो ओर से गांव बढ़ नहीं सका
जनसंख्या का भार भी नहीं बढ़ा
बैतूल जिला मुख्यालय से मात्र 9 कि.मी. की दूरी पर स्थित सर्वोदयी एवं संत टुकड़ो जी महाराज का अनुयायी गांव रोंढ़ा अपने आसपास में फैले लहलहाते खेत - खलिहानो के कारण बढ़ नहीं सका. गांव की आबादी ने गांवो के कच्चे मकानो को छोड़ अपने - अपने खेतो में अपनी बसाहट शुरू कर दी. गांव बढ़े तो गांव की शमशान के लिए जमीन तक कम पड़ गई. गांवो की मकानो की संख्या बढ़ी लेकिन गांव की आबादी का आकड़ा आज भी दो हजार से ऊपर नहीं जा सका है. रोंढ़ा गांव से आसपास के गांवो की दूरियां 3 से 5 कि.मी. की होने के कारण गांव सोशल डिस्टेंसिंग का अद्धितीय उदाहरण बन कर सामने आए है. गांवो में गलियों की भरमार है

 जिसके पीछे का कारण है कि हर व्यक्ति ने अपने मकान के चारो ओर खाली जमीनो को छोड़ रखा है जिसमे वह अपनी जरूरतो को संग्रहित करके रखता है ताकि  उसका वह उपयोग कर सके. गांवो में जानवरो के कोठे भी होना यह सिद्ध करता है कि व्यक्ति ने गांव में लम्बी - चौड़ी जमीनो पर सबका सुरक्षित आशियाना बना रखा है. पहले लोग गांवो में अपने दुधारू एवं पालतु पशुओ को रखा करते थे लेकिन परिवार बढऩे के बाद उनको खेतो में बनवाए गए मकानो मे ठहराया जाता है. जानकार सूत्रो का ऐसा मानना है कि जिले की 70 प्रतिशत आबादी गांवो में तथा 30 प्रतिशत शहरो में निवास करती है.  

भौरा - मलकापुर को छोड़ कर जिले के एक
भी गांव में कोई नहीं हो सका होम आयसोलेशन
कोरोना जैसी महामारी के संक्रामक काल में प्रधानमंत्री से लेकर गांव के प्रधान तक सोशल डिस्टेंस के नियमो का लोगो से पालन करने की गुहार लगा रहे है, ऐसे में बैतूल जिले के गांव अपने आप में बेमिसाल है क्योकि गांवो में पहले से ही एक दुसरे के मकानो से लेकर खेत - खलिहानो तक के बीच काफी लम्बी चौड़ी दूरियां बना रखी है.

 आज यही कारण है कि जिले के गांवो में से क्वारेंटाइन में भर्ती नागरिकों की संख्या 57 है जिसमे एक भी ग्रामिण नहीं है. इसी कड़ी में आयसोलेशन में भर्ती मरीज सभी 6 मरीज शहरी आबादी से आते है. यदि हम शहर के अनुपात में गांवो में होम आयसोलेशन व्यक्तियों की संख्या 2,879 है उसमें फोर लेन नेशनल हाइवे नागपुर - भोपाल पर बसे गांव भौरा एवं जम्मू से कश्मीर को जोडऩे वाले रेल मार्ग पर बसे गांव मलकापुर को दरकिनार करे  तो गांवो से एक भी व्यक्ति का नाम इस सूचि में दर्ज नहीं है. 

मौजूदा समय में बैतूल जिले में होम आयसोलेशन से डिस्चार्ज संख्या. 1357 है. आज दिनांक तक लिये गये कुल सेम्पल संख्या. 108 है. इन पंक्तियो के लिखे जाने तक गये 08 लोगो के सेम्पल लिए गए है. जिले से 30 लोगो की रिपोर्ट अप्राप्त है. जिले में संक्रामक काल से लेकर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मात्र भैसदेही का एक जमाती पॉजिटिव पाया गया जिसके स्वास्थ में सुधार आ गया है 

और संभवत: 20 तारीख को वह अपने घर आ जाएगा. जिले में स्क्रीनिंग किये गये कुल मरीज संख्या. 28,515 जिसमें सामान्य सर्दी, खांसी, बुखार के मरीज संख्या 2,478 है जिसमें गांवो की आबादी का अनुपात सबसे कम है. जिला जन संपर्क कार्यालय के अनुसार रोजगार की तलाश में गांव से बाहर गए लोगो को गांव वापसी होने पर गांव के बाहर स्कूल एवं छात्रावासो में आयसोलेशन किया गया लेकिन जिले के गांव में किसी घर को होम आयसोलेशन किया गया है.

बैतूल जिले में प्रकृति एवं मानव आकृति द्वारा निर्मित एक दुसरे के बीच की दूरियां भले ही बीमारी को रोकने में कारगर सिद्ध हुई है लेकिन जिले की आपसी एकता एवं अखण्डता बेमिसाल है तभी तो गांव - गांव में एक दुसरे के घरो का चुल्हा चला या नहीं एक दुसरे से पुछ लेते है ताकि जरूरत मंदो की जरूरतो की पूर्ति की जा सके.

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