भोपाल एम्स में हर तरह के कैंसर की जांच शुरू, फीस 50 से 300 रुपए तक, एम्स पहला अस्पताल है, जहां ये जांचें शुरू की गई हैं - samay khabar

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भोपाल एम्स में हर तरह के कैंसर की जांच शुरू, फीस 50 से 300 रुपए तक, एम्स पहला अस्पताल है, जहां ये जांचें शुरू की गई हैं

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प्रदेश के किसी भी सरकारी अस्पताल या मेडिकल कॉलेज में अभी आटोमैटिक तरीके से बायोप्सी नहीं हो रही है। इस वजह से क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं आती। एटीपी से बायोप्सी में बिल्कुल शुरुआती अवस्था में कैंसर का पता लग जाएगा। जांच में समय भी कम लगता है, क्योंकि इसमें सारा काम मशीन से होता है।


भोपाल। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइसेंस (एम्स) भोपाल में कैंसर की जांच शुरू हो गई है। यहां हर तरह के कैंसर यानि शरीर के किसी भी अंग में कैंसर की जांच (बायोप्सी) होने लगी है। जांच के लिए हर दिन करीब 40 सैंपल पहुंच रहे हैं। कुछ जांचें ऐसी हैं, जो सेंट्रल इंडिया में सिर्फ यहां पर शुरू की गई हैं। इसके लिए आटोमैटिक टिश्यू प्रोसेसर (एटीपी) व माइक्रोटोम मशीन लगाई गई हैं।



मैन्युअल बायोप्सी से जांच में मांस के टुकड़े को एक केमिकल से निकालकर दूसरे केमिकल में डालना होता है। इसमें करीब हफ्ता भर लग जाता है । ये जांचें एम्स दिल्ली के रेट पर 50 रुपए से 300 रुपए तक में हो जाएंगी निजी अस्पतालों में इन्हीं जांचों के लिए 2000 से 4000 रुपए तक लगते हैं।


सेंट्रल इंडिया में कही नहीं






एम्स के पैथोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. नीलकमल कपूर ने बताया कि फ्लोसाइटोमीटर से ब्लड कैंसर व लिंफोमा (लिंफ नोड के कैंसर) की जांच अभी किसी भी सरकारी या निजी अस्पताल में नहीं हो रही थी। एम्स पहला अस्पताल है, जहां ये जांचें शुरू की गई हैं। इस मशीन से जांच की क्वालिटी बहुत अच्छी होती है।

ये जांचें भी शुरू

थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया : एम्स में एचपीएलसी मशीन भी लग गई। इससे थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया व खून से जुड़ी अन्य बीमारियों की भी जांच होने लगी है। इससे थैलेसीमिया का पता चल सकेगा। साथ ही थैलेसीमिया मरीजों को बार-बार ब्लड चढ़ाने से क्या फायदा-नुकसान हो रहा है। यह जानकारी मिल सकेगी।

इम्यूनोहिस्ट्रोेकेमेस्टी : इससे जुड़ी जांचें भी एम्स में शुरू हो गई हैं। कैंसर के कुछ मरीजों को भी यह जांचें करवाना पड़ती हैं। कैंसर की कुछ बीमारियों में बायोप्सी के साथ ये जांचें कराने की सलाह डॉक्टर देते हैं। प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ये जांचें भी नहीं हो पा रही हैं।

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