जान लीजिये एमपी की ये अनोखी दुनिया, 12 गांवों की इस घाटी को देख रह जाएंगे दंग

छिंदवाड़ा जिले के तामिया ब्लॉक में स्थित पातालकोट मानो धरती के गर्भ में समाया है। तकरीबन 89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह एक घाटी है, जो सदियों तक बाहरी दुनिया के लिए अनजान और अछूती बनी रही। पातालकोट में 12 गांव समाये हुए हैं ये गांव हैं- गैलडुब्बा, कारेआम, रातेड़, घटलिंगा-गुढ़ीछत्री, घाना कोड़िया, चिमटीपुर, जड़-मांदल, घर्राकछार, खमारपुर, शेरपंचगेल, सुखाभंड-हरमुहुभंजलाम और मालती-डोमिनी।



बाहरी दुनिया का यहां के लोगों से संपर्क हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है, इनमें से कई गांव ऐसे हैं, जहां आज भी पहुंचना बहुत मुश्किल है, जमीन से काफी नीचे होने और विशाल पहाड़ियों से घिरे होने के कारण इसके कई हिस्सों में सूरज की रौशनी भी देर से और कम पहुंचती है, मानसून में बादल पूरी घाटी को ढक लेते हैं और बादल यहां तैरते हुए नजर आते हैं।
इन सब को देख सुन कर लगता है कि मानो धरती के भीतर बसी यह एक अलग ही दुनिया हो। सतपुड़ा की पहाड़ियों में करीब 1700 फुट नीचे बसे ये गांव भले ही तिलिस्म का एहसास कराते हों, लेकिन यहां बसने वाले लोग हम और आपकी तरह हांड-मांस के इंसान ही हैं, यह लोग भारिया और गौंड आदिवासी समुदाय के हैं, जो अभी भी हमारे पुरखों की तरह अपने आप को पूरी तरह से प्रकृति से जोड़े हुए हैं। मुनाफा आधारित व्यवस्था और दमघोंटू प्रतियोगिता से दूर इनकी जरूरतें सीमित हैं।

प्राकृतिक संसाधनों के साथ इनका रिश्ता सहअस्तित्व का है और अपनी संस्कृति, परम्परा, जिंदगी जीने व आपसी व्यवहार के तरीके को भी इन्होनें अभी भी काफी हद तक पुरातन बनाया हुआ है बिलकुल सहज सरल और निश्छल। अगर उनके रहन–सहन, खान-पान, दवा-दारू की बात करें, तो इस मामले में भी वे अभी भी काफी हद तक जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं लेकिन इधर बाहरी दुनिया से संपर्क और सदियों से उनके द्वारा संजो कर रखे गए प्रकृति से छेड़-छाड़ की वजह से अब वे संकट में दिखाई दे रहे हैं। दूसरी तरफ आधुनिक विकास भी उन तक नहीं पहुंची है और इससे होने वाले फायदे के दायरे से उन्हें बेदखल रखा गया है।
पाताल लोक को लेकर भले ही कई मिथक हों, लेकिन यहां की समस्याएं यथार्थ हैं, वैसे तो देश के सभी हिस्सों की तरह यहां भी विकास की तमाम योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इसका लाभ ज़्यादातर लोगों तक पहुंच नहीं पाया है, 2007 में यहां पहला आंगनवाड़ी केंद्र खुला था, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित पातालकोट विकास प्राधिकरण की वजह से यहां स्कूली शिक्षा, आईसीडीएस, प्राथमिक स्वास्थ्य जैसी सेवाएं पहुँच गई हैं, लेकिन कई सुविधाएं अभी भी पहुंच से दूर हैं।
गैलडुब्बा तक पक्की सड़क की वजह से यहां आना जाना आसान हो गया है, लेकिन बाकि क्षेत्र अभी भी कटे हुए हैं, इसी तरह से इनकी खेती परंपरागत और नये तरीकों के बीच ही उलझ कर रह गई है, वे अपने पहले के फसलों से तकरीबन हाथ धो चुके हैं। नई नगदी फसलों से भी कोई खास फायदा नजर नहीं आ रहा है, इस तरह से उनके पुराने खाद्य सुरक्षा तंत्र के बिखरने का असर पोषण पर पड़ रहा है जिसकी वजह से जानलेवा कुपोषण वहां अपना पैठ बना चुकी है ।
यहां पानी की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है, और के लोगों के लिए पानी का एकमात्र स्रोत पहाड़ों से निकलने वाली जलधाराएं रही हैं। पहले इन जलधाराओं में साल भर पानी रहता था, लेकिन अब अपेक्षाकृत ठंढे महीनों में भी यह सूख जाते हैं, यह सब जलवायु परिवर्तन और बाहरी हस्तक्षेप की वजह से हुआ है। पातालकोट की जैविक विवधता, प्राकृतिक संसाधन और वन-संपदा खतरे में हैं। यहां की दुर्लभ जड़ी बूटियों पर लालची व्यापारियों की नजर पड़ चुकी है और वे इसका बड़ी बेरहमी से दोहन करना शुरू कर चुके हैं, अगर जल्दी ही इस पर रोक नहीं लगी तो पातालकोट का यह बहुमूल्य खजाना खत्म हो जाएगा।

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