लड़कियों को पढ़ाने के लिए ,माता पिता के पैर तक पकड़ती है ,गांव की बेटी ,

इंदौर -
हम बात कर रह हैं इंदौर से महज 20 किमी दूर सांवेर तहसील के गांव मावलाखेड़ी की। हालातों से जूझकर वर्ष 2010 में पहली बार एक लड़की वर्षा वर्मा 10वीं पास हुई। वह अब गांव की सभी लड़कियों के लिए आदर्श बन चुकी है। इस आधुनिक शिक्षा के दौर में जब लड़कियां मेडिकल, मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग जैसी बड़े कोर्स में डिग्री हासिल कर रही हैं, ऐसे में मावलाखेड़ी में अभी भी पढ़ाई के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इस संघर्ष को वर्षा ने अभियान में बदल दिया है।
फिलहाल वह आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बन चुकी है। गांव वाले उसे सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा मानकर इज्जत भी करते हैं। उसका एक ही लक्ष्य है कि लड़की की पढ़ाई न छूटे। हर लड़की आत्मनिर्भर बने ताकि भविष्य में उसे कोई परेशानी न झेलना पड़े। वह किसी के घर जाकर बेटी को पढ़ाने के लिए हाथ जोड़ती है तो माता-पिता भी उसकी बात टाल नहीं पाते।
हालांकि अभी भी ग्रामीणों में जागरुकता के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं। इनको महिला एवं बाल विकास विभाग ने उल्लेखनीय मानकर कार्यकर्ता को संभाग में मॉडल के तौर पर पेश करने का फैसला लिया है। संयुक्त संचालक राजेश मेहरा ने बताया कि सभी आंगनवाड़ी केंद्रों को इसकी मिसाल दी जा रही है ताकि लड़कियों की शिक्षा का स्तर शत प्रतिशत हो सके।
कभी बेटियों को स्कूल भेजने से कतराने वाले ग्रामीण अब उनके पास होने पर मिठाई बांट रहे हैं। जहां कभी एक भी लड़की आठवीं से आगे नहीं पढ़ी थी और आज नौ लड़कियां 10वीं और 12वीं पास कर चुकी हैं। यह बदलाव किसी सरकारी सिस्टम से नहीं बल्कि गांव की ही एक बेटी वर्षा के ठानने से हुआ। आज उसकी एक ही इच्छा है, गांव की हर बेटी पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बने। इसके लिए वह माता-पिता के पैर पकड़ने से भी नहीं हिचकती। ग्रामीण अब इस बात से चिंतित रहते हैं कि अगर बेटी की पढ़ाई रोक दी तो वर्षा हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी। 
दीदी के कारण कॉलेज तक पहुंचे वरना शादी हो जाती
गांव की शिवानी, पूजा और अंजू तीनों इस साल कॉलेज में पहुंच चुकी हैं। तीनों सांवेर के सरकारी कॉलेज में जाती है। वे बताती हैं कि हम कभी सोच नहीं सकते थे कि कॉलेज जा पाएंगे लेकिन वर्षा दीदी का हर परिवार पर इतना ध्यान रहता है कि कोई उनके खिलाफ नहीं जा पाता। अगर पढ़ाई के लिए इतना प्रोत्साहन नहीं मिलता तो शादी कर दी जाती। कॉलेज में जाने के बाद से गांव में लड़कियों का सम्मान काफी बढ़ गया है। ऐसे ही सीमा, अर्चना सहित चार लड़कियां बघाना गांव के हाई स्कूल जाने लगी हैं।
खुद ने भी किया संघर्ष
वर्षा ने भी पढ़ने के लिए बेहद संघर्ष किया। वह बताती है कि आठवीं तक तो गांव में स्कूल होने से पढ़ाई हो गई लेकिन हाई स्कूल 4 किमी दूर पालिया में था। परिवार की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर थी तो पढ़ने के लिए मना कर दिया था। माता-पिता को विश्वास दिलाया कि खूब मेहनत करूंगी। बीच सत्र में एडमिशन लिया तो साइकिल भी नहीं मिली थी। इस कारण 4 किमी जंगल के रास्ते स्कूल आना-जाना करती थी।
बारिश के दिनों में सहेली के घर बस्ता रखना पड़ता था। 10वीं पास करने के बाद गांव में काफी सम्मान मिला लेकिन फिर पारिवारिक परेशानियां आड़े आ गई। इससे आगे की पढ़ाई नहीं हो सकी। इंदौर में शादी हुई लेकिन गांव की लड़कियों की पढ़ाई की चिंता में फिर यहीं आ गई। पति मनोज सिसोदिया ने भी साथ दिया। उन्होंने भी गांव में काम शुरू कर दिया। अभी भी कई लड़कियां हैं जिनके परिजन शिक्षा का महत्व नहीं समझते लेकिन हमारा प्रयास जारी रहे|

















साभार -नईदुनिया 


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